प्रेगनेंसी कई स्थितियों की वजह से ट्रिगर हो सकती है. इसमें मस्कुलर डिस्ट्रॉफी भी शामिल है. मस्कुलर डिस्ट्रॉफी को आनुवंशिक माना गया है. यह बीमारी एक या दोनों माता-पिता से मिले जीन में म्यूटेशन होने के कारण होती है. ऐसे में अक्सर गर्भवती महिलाओं के मन में सवाल आता है कि मस्कुलर डिस्ट्रॉफी का बच्चे के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ सकता है? तो आपको बता दें कि मस्कुलर डिस्ट्रॉफी प्रेगनेंसी और होने वाले शिशु के स्वास्थ्य को अलग-अलग तरह से प्रभावित कर सकता है.

आज इस लेख में आप मस्कुलर डिस्ट्रॉपी और प्रेगनेंसी के बीच संबंध के बारे में विस्तार से जानेंगे -

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  1. मस्कुलर डिस्ट्रॉफी क्या है?
  2. मस्कुलर डिस्ट्रॉफी का प्रेगनेंसी पर असर
  3. मस्कुलर डिस्ट्रॉफी का भ्रूण पर असर
  4. मस्कुलर डिस्ट्रॉफी वाली महिलाओं में प्रेगनेंसी के लक्षण
  5. सारांश
मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और प्रेगनेंसी के डॉक्टर

मस्कुलर डिस्ट्रॉफी बीमारियों का एक समूह होता है. यह समस्या कमजोरी और मांसपेशियों को नुकसान पहुंचने के कारण हो सकती है. इस बीमारी में असामान्य जीन हेल्दी मसल्स के निर्माण के लिए जरूरी प्रोटीन के उत्पादन में बाधा डालते हैं. मस्कुलर डिस्ट्रॉफी कई प्रकार की होती है. इसके सबसे आम प्रकार के लक्षण बचपन में शुरू हो जाते हैं. इस बीमारी का कोई इलाज नहीं होता है, लेकिन कुछ दवाइयों की मदद से इसके लक्षणों में सुधार किया जा सकता है. मस्कुलर डिस्ट्रॉफी की समस्या किसी को भी हो सकती है. अगर किसी गर्भवती महिला को यह समस्या होती है, तो इसका असर उसके बच्चे पर भी पड़ सकता है. 

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आपको बता दें कि अगर किसी गर्भवती महिला को मस्कुलर डिस्ट्रॉफी है, तो उस पर इसका असर अन्य लोगों की तुलना में अलग हो सकता है. इसके साथ ही होने वाले शिशु पर भी मस्कुलर डिस्ट्रॉफी का प्रभाव अलग हो सकता है, लेकिन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी की वजह से सभी की मांसपेशियों को नुकसान जरूर होता है. मस्कुलर डिस्ट्रॉफी वाले लोगों को कमजोरी का भी सामना करना पड़ सकता है. मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से गर्भवती महिला व भ्रूण कैसे प्रभावित होता है, यह अलग-अलग कारकों पर निर्भर करता है.

कुछ महिलाएं मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से ज्यादा प्रभावित नहीं होती हैं, जबकि कुछ को हृदय संबंधी समस्या हो सकती है. इसलिए, अगर किसी गर्भवती महिला को मस्कुलर डिस्ट्रॉफी है, तो डिलीवरी के समय अतिरिक्त देखभाल की जरूरत हो सकती है.  

अगर किसी गर्भवती महिला को श्वसन संबंधी मस्कुलर डिस्ट्रॉफी है, तो इस स्थिति में डिलीवरी के समय में अतिरिक्त देखभाल की जरूरत पड़ सकती है. श्वसन संबंधी मस्कुलर डिस्ट्रॉफी में समस्याएं बढ़ सकती है.

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अगर किसी गर्भवती महिला को मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नहीं है, लेकिन उसके माता-पिता में से किसी को यह बीमारी रही है, तो उसके जरिए होने वाले शिशु को यह समस्या हो सकती है.

कुछ मस्कुलर डिस्ट्रॉफी गंभीर होते हैं. ऐसे में अगर किसी महिला को गंभीर मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के हल्के लक्षण भी हैं, तो यह उसके बच्चे में भी हो सकता है. इस स्थिति में आने वाली पीढ़ी मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है, क्योंकि कुछ प्रकार की मस्कुलर डिस्ट्रॉफी समस्याएं पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती जाती हैं.

ऐसे में टेस्ट के जरिए डॉक्टर पता कर सकते हैं कि शिशु को मस्कुलर डिस्ट्रॉफी की समस्या है या नहीं. यह पता करने के लिए प्रेगनेंसी के 15वें से 18वें सप्ताह में एमनियोटिक टेस्ट किया जाता है या फिर 10वें से 12वें सप्ताह में कोरियोनिक विलस सैंपलिंग के जरिए इसका पता लगाया जाता है.

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अगर किसी महिला को मस्कुलर डिस्ट्रॉफी है और वह गर्भवती होती है, तो उसे कुछ लक्षणों का सामना करना पड़ सकता है -

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मस्कुलर डिस्ट्रॉफी मांसपेशियों की कमजोरी का कारण बन सकता है. यह एक जेनेटिक बीमारी होती है, जो किसी व्यक्ति को अपने माता या पिता से मिल सकती है. अगर किसी गर्भवती महिला को मस्कुलर डिस्ट्रॉफी की बीमारी है, तो होने वाले शिशु के भी इससे ग्रस्त होने की आशंका रहती है. आपको बता दें कि मस्कुलर डिस्ट्रॉफी वाली महिलाओं को स्तनपान में कोई समस्या नहीं होती है. अगर किसी महिला के माता या पिता को मस्कुलर डिस्ट्रॉफी रही है, तो प्रेगनेंसी प्लान करने से पहले एक बार डॉक्टर की राय जरूर लेनी चाहिए.

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